बच्चों में दिल की बीमारी: लक्षण, कारण और इलाज
जब किसी बच्चे को दिल से जुड़ी कोई परेशानी बताई जाती है, तो माता-पिता के मन में सबसे पहला सवाल यही आता है: “क्या यह ठीक हो सकता है?” ज़्यादातर मामलों में जवाब “हां” होता है, बशर्ते समय पर सही निदान और इलाज मिले। बच्चों में दिल की बीमारी, जिसे चिकित्सकीय भाषा में जन्मजात हृदय रोग (Congenital Heart Disease या CHD) कहा जाता है, भारत में हर साल लगभग 9 में से हर 1,000 जीवित जन्मे बच्चों में पाई जाती है, यानी हर साल 2 लाख से अधिक बच्चे इसके साथ जन्म लेते हैं। इनमें से लगभग हर पांचवें बच्चे को जीवन के पहले साल में ही इलाज की ज़रूरत पड़ती है। (स्रोत: इंडियन पीडियाट्रिक्स जर्नल में प्रकाशित “Congenital Heart Disease in India: A Status Report” – Indian Pediatrics, 2018)
दिल्ली के फोर्टिस अस्पताल, शालीमार बाग में कार्डियोथोरेसिक और वैस्कुलर सर्जरी विभाग के निदेशक डॉ. दिनेश कुमार मित्तल, नवजात शिशुओं से लेकर बड़े बच्चों तक, जन्मजात हृदय रोग के निदान और इलाज में 25 वर्षों से अधिक का अनुभव रखते हैं। इस लेख में हम आसान भाषा में समझेंगे कि बच्चों में दिल की बीमारी क्यों होती है, इसके लक्षण क्या हैं, और इसका इलाज कैसे किया जाता है।
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बच्चों में दिल की बीमारी क्या है?
बच्चों में दिल की बीमारी का मतलब है दिल की संरचना या उसके काम करने के तरीके में कोई गड़बड़ी, जो अक्सर जन्म से ही मौजूद होती है। इसे जन्मजात हृदय रोग (CHD) कहा जाता है क्योंकि यह बच्चे के गर्भ में पल रहे दिल के विकास के दौरान होती है, न कि बाद में किसी बीमारी की वजह से।
इसमें दिल की दीवारों में छेद (जैसे ASD या VSD), दिल के वाल्व का ठीक से न बनना, या दिल की बड़ी रक्त-नलिकाओं का असामान्य होना शामिल हो सकता है। कुछ बच्चों में यह समस्या हल्की होती है और अपने आप ठीक हो जाती है, जबकि कुछ को सर्जरी या कैथेटर-आधारित प्रक्रिया की ज़रूरत होती है। जन्मजात हृदय रोग के बारे में विस्तार से जानें।
बच्चों में दिल की बीमारी के कारण क्या हैं?
ज़्यादातर मामलों में जन्मजात हृदय रोग का कोई एक सीधा कारण नहीं होता, बल्कि यह आनुवंशिक और गर्भावस्था से जुड़े कई कारकों के मेल से होता है।
मुख्य कारणों में शामिल हैं:
- आनुवंशिक कारण: परिवार में पहले किसी को दिल की बीमारी होना, या डाउन सिंड्रोम जैसी क्रोमोसोमल समस्याएं
- सगोत्र विवाह: माता-पिता के बीच खून का रिश्ता होने पर जोखिम बढ़ जाता है
- गर्भावस्था के दौरान संक्रमण: पहली तिमाही में रूबेला (जर्मन खसरा) जैसा संक्रमण
- मां की सेहत: अनियंत्रित मधुमेह, मोटापा, या कुछ दवाओं/शराब का सेवन गर्भावस्था के दौरान
- समय से पहले जन्म या जन्म के समय कम वज़न
अधिकतर बच्चों में इनमें से कोई स्पष्ट कारण नहीं मिलता, इसलिए हर गर्भवती महिला को नियमित जांच करवाना ज़रूरी है।
बच्चों में दिल की बीमारी के लक्षण क्या हैं?
बच्चों में दिल की बीमारी के लक्षण बच्चे की उम्र और दिल की खराबी की गंभीरता पर निर्भर करते हैं। नवजात शिशुओं में लक्षण जल्दी दिखते हैं, जबकि हल्की समस्याओं का पता कई सालों बाद चलता है।
नवजात शिशुओं और छोटे बच्चों में लक्षण:
- होंठों, उंगलियों या नाखूनों का नीला पड़ना (सायनोसिस)
- दूध पीते समय जल्दी थक जाना या सांस फूलना
- तेज़ या मुश्किल सांस लेना
- वज़न ठीक से न बढ़ना
- बार-बार पसीना आना, खासकर दूध पिलाते समय
- बार-बार सांस की नली में संक्रमण होना
बड़े बच्चों में लक्षण:
- खेलते या दौड़ते समय जल्दी सांस फूलना और थकान होना
- साथियों की तुलना में शारीरिक गतिविधि में पीछे रहना
- सीने में दर्द या धड़कन का अनियमित होना
- बेहोशी या चक्कर आना
- पैरों, टखनों या पेट में सूजन
अगर आपके बच्चे में ऊपर बताए गए किसी भी लक्षण की पहचान होती है, तो देर न करें। शुरुआती जांच से समय पर इलाज संभव होता है और जटिलताओं से बचाव होता है। ब्लू बेबी सिंड्रोम जैसी स्थितियों में तुरंत मूल्यांकन की आवश्यकता होती है।
बच्चों में दिल की बीमारी की जांच (निदान) कैसे होती है?
बच्चों में दिल की बीमारी का निदान क्लिनिकल जांच और इमेजिंग टेस्ट के मेल से किया जाता है, जिससे दिल की संरचना और खून के बहाव की सटीक तस्वीर मिलती है।

आमतौर पर इस्तेमाल होने वाले टेस्ट:
- पल्स ऑक्सीमेट्री: खून में ऑक्सीजन का स्तर मापने के लिए, अक्सर हर नवजात की जन्म के तुरंत बाद जांच होती है
- इकोकार्डियोग्राम (Echo): अल्ट्रासाउंड की मदद से दिल की संरचना और वाल्व की कार्यक्षमता देखी जाती है, यह सबसे महत्वपूर्ण टेस्ट है
- ECG (इलेक्ट्रोकार्डियोग्राम): दिल की विद्युत गतिविधि और धड़कन की लय की जांच
- छाती का एक्स-रे: दिल के आकार और फेफड़ों में खून के बहाव का आकलन
- CT/MRI एंजियोग्राफी: जटिल मामलों में दिल की रक्त-नलिकाओं की विस्तृत तस्वीर के लिए
- कार्डियक कैथेटराइज़ेशन: सर्जरी या स्टेंटिंग से पहले सटीक दबाव और रक्त-प्रवाह मापने के लिए
बच्चों में दिल की बीमारी का इलाज क्या है?
बच्चों में दिल की बीमारी का इलाज दोष के प्रकार, उसकी गंभीरता और बच्चे की उम्र के अनुसार तय किया जाता है, और इसमें दवाइयों से लेकर सर्जरी तक कई विकल्प शामिल हैं।
- निगरानी और दवाइयां: छोटे दोष, जैसे छोटा ASD या VSD, अक्सर अपने आप बंद हो जाते हैं। ऐसे मामलों में नियमित इकोकार्डियोग्राम से निगरानी की जाती है। बड़े दोषों में हृदय पर दबाव कम करने के लिए दवाइयां दी जा सकती हैं।
- कैथेटर-आधारित (डिवाइस क्लोज़र) प्रक्रिया: कुछ छेद, जैसे secundum ASD या PDA, बिना चीरा लगाए, कैथेटर के ज़रिए एक छोटा डिवाइस लगाकर बंद किए जा सकते हैं। यह प्रक्रिया कम आक्रामक है और रिकवरी तेज़ होती है। ASD रिपेयर के बारे में यहां पढ़ें।
- ओपन-हार्ट सर्जरी: जटिल दोषों, जैसे Tetralogy of Fallot या बड़े VSD, में ओपन-हार्ट सर्जरी की ज़रूरत होती है, जिसमें दिल की संरचना को सीधे ठीक किया जाता है। जन्मजात हृदय सर्जरी की पूरी जानकारी देखें।
- विशेष प्रक्रियाएं: कुछ जटिल स्थितियों (जैसे सिंगल वेंट्रिकल दोष) में Glenn या Fontan जैसी चरणबद्ध सर्जरी की जाती है, और अनियमित हृदय गति के लिए बच्चों में पेसमेकर प्रत्यारोपण की भी आवश्यकता पड़ सकती है।
बच्चों में दिल की सर्जरी का खर्च कितना होता है?
भारत में बच्चों की जन्मजात हृदय सर्जरी का खर्च दोष के प्रकार, इलाज की विधि (डिवाइस क्लोज़र बनाम ओपन सर्जरी) और अस्पताल में रुकने की अवधि पर निर्भर करता है।
डिवाइस क्लोज़र जैसी कैथेटर-आधारित प्रक्रियाओं में डिवाइस की कीमत के कारण खर्च अधिक हो सकता है, जबकि जटिल दोषों की ओपन सर्जरी में अस्पताल में लंबे समय तक रुकने की वजह से लागत बढ़ जाती है। सटीक अनुमान के लिए, बच्चे की जांच रिपोर्ट देखने के बाद ही डॉक्टर पूरा खर्च बता सकते हैं। विस्तृत जानकारी के लिए भारत में जन्मजात हृदय सर्जरी की लागत और ASD सर्जरी की लागत देखें।
बच्चे को हृदय रोग विशेषज्ञ को कब दिखाना चाहिए?
अगर आपके बच्चे में सांस फूलना, नीलापन, दूध पीने में परेशानी, वज़न न बढ़ना, या असामान्य थकान जैसे लक्षण दिखें, तो तुरंत पीडियाट्रिक कार्डियक विशेषज्ञ से सलाह लेनी चाहिए।
इसके अलावा, अगर परिवार में जन्मजात हृदय रोग का इतिहास है, गर्भावस्था के दौरान अल्ट्रासाउंड में दिल से जुड़ी कोई असामान्यता दिखी है, या बच्चे में डाउन सिंड्रोम जैसी कोई जेनेटिक स्थिति है, तो जन्म के तुरंत बाद ही हृदय की स्क्रीनिंग करवाना उचित है। जितनी जल्दी निदान होगा, इलाज उतना ही प्रभावी और सुरक्षित होगा।
बच्चों में दिल की बीमारी का इलाज कराएं
बच्चों के दिल का इलाज एक नाज़ुक और अनुभव-आधारित काम है, जहां सही निदान और सही समय पर सही फैसला बच्चे के भविष्य के लिए बेहद मायने रखता है।
डॉ. दिनेश कुमार मित्तल को दिल्ली-एनसीआर के परिवार भरोसा करते हैं क्योंकि:
- AIIMS, नई दिल्ली से कार्डियोथोरेसिक सर्जरी में MCh
- उत्तर भारत में नवजात हृदय सर्जरी के क्षेत्र में अग्रणी अनुभव
- 10,000 से अधिक सफल हृदय सर्जरी, जिनमें जटिल जन्मजात दोषों की मरम्मत शामिल है
- मिलान, इटली से एंडोवैस्कुलर स्टेंटिंग में फेलोशिप
- फोर्टिस अस्पताल, शालीमार बाग में समर्पित बाल हृदय सेवाएं और अत्याधुनिक कार्डियक ICU
परामर्श बुक करें
अगर आपके बच्चे को दिल से जुड़ी कोई समस्या बताई गई है, या आप किसी लक्षण को लेकर चिंतित हैं, तो देर करने की बजाय समय पर विशेषज्ञ की राय लें। परामर्श के दौरान डॉ. दिनेश कुमार मित्तल आपको देंगे:
- बच्चे के लक्षणों और मेडिकल इतिहास की विस्तृत समीक्षा
- मौजूदा इकोकार्डियोग्राम या इमेजिंग रिपोर्ट का विश्लेषण
- दोष की गंभीरता और उपचार के सभी विकल्पों की स्पष्ट जानकारी
- इलाज, रिकवरी और खर्च को लेकर पारदर्शी चर्चा
डॉ. दिनेश कुमार मित्तल से अपॉइंटमेंट बुक करने के लिए फोर्टिस अस्पताल, शालीमार बाग से सीधे संपर्क करें या ऑनलाइन अपॉइंटमेंट सुविधा का उपयोग करें।
